ज़माने के लिए तो यारों; आसमां हूँ मैं…!
अपने ही पिंजरे का पर; कहकशां हूँ मैं…!!
हर रोज़ सवालों के दौर से गुजरती है ज़िन्दगी...!
अपने आप के लिए जैसे; कोई इम्तेहां हूँ मैं...!!
अब तो आईना भी आँखों से पुछ लेता है..!
माशूक के लिए क्या, वही जान-ए-जां हूँ मैं..??
देखने वालों के लिए अकेला ही सही पर...!
मालूम है मुझे; कि खुद में कारवां हूँ मैं....!!
पूछते हैं लोग मेरे तख़ल्लुस का राज़ अक्सर...!
कहो; कोरे 'काग़ज़' के सिवा और क्या हूँ मैं...!!
___________हेमंत शर्मा 'कागज़'
(तख़ल्लुस----उपनाम; कहकशां---परिंदा)
अपने ही पिंजरे का पर; कहकशां हूँ मैं…!!
हर रोज़ सवालों के दौर से गुजरती है ज़िन्दगी...!
अपने आप के लिए जैसे; कोई इम्तेहां हूँ मैं...!!
अब तो आईना भी आँखों से पुछ लेता है..!
माशूक के लिए क्या, वही जान-ए-जां हूँ मैं..??
देखने वालों के लिए अकेला ही सही पर...!
मालूम है मुझे; कि खुद में कारवां हूँ मैं....!!
पूछते हैं लोग मेरे तख़ल्लुस का राज़ अक्सर...!
कहो; कोरे 'काग़ज़' के सिवा और क्या हूँ मैं...!!
___________हेमंत शर्मा 'कागज़'
(तख़ल्लुस----उपनाम; कहकशां---परिंदा)